1। श्री वार्ड की वासनापूर्ण निगाहें

लिली का नज़रिया

"वो बार‑बार मेरी छाती की तरफ़ ही क्यों देख रहा है...?"

ये सब सच‑मुच हो रहा है, ये बात ही मुझे हैरान कर रही थी। यक़ीन ही नहीं हो रहा था कि मेरा मालिक इतनी हिम्मत दिखा रहा है कि मेरी तरफ़ से नज़र ही नहीं हटा रहा, जबकि मैं उसके ही बच्चे को दूध पिला रही हूँ। और उससे भी बुरा ये था कि उसके इस बेहया घूरने से मुझे भीतर ही भीतर अजीब‑सा सुख मिल रहा था। मुझे मालूम था कि मुझे अपनी छाती ढक लेनी चाहिए थी, या किसी और कमरे में जाकर थोड़ा पर्दा कर लेना चाहिए था, लेकिन मैं वहीं ठहरी रही, उसके उन बेबाक, बेशर्म निगाहों का लुत्फ़ उठाती रही जो वो मुझ पर डाल रहा था।

कभी‑कभी तो वो कुर्सी खींचकर बिलकुल पास बैठ जाता, आराम से टिककर, और उसकी नज़रें मुझसे हटती ही नहीं। उन पलों में मेरे अंदर एक अजीब‑सी चाह उठती—कि मैं उसकी गोद में चढ़ जाऊँ और उसे चूम लूँ, या शायद अपनी छातियाँ उसी को भी पेश कर दूँ, ताकि वो भी उन्हें चूस सके। एक बड़े मर्द का मेरे सीने से दूध पीना कैसा लगेगा...?

जब मुझे वॉर्ड हवेली में नौकरी की पेशकश हुई थी, तब मैंने कभी नहीं सोचा था कि मैं ऐसी हालत में पहुँच जाऊँगी। जिस दिन अनाथालय की मदर सुपीरियर ने मुझे अपने दफ़्तर बुलाया था, वो मेरी ज़िंदगी का सबसे खुश दिन था। मैं घबराहट में अपने हाथ रसोई के तौलिये से पोंछ रही थी—मैं बच्चों के लिए खाना बना रही थी—और जल्दी‑जल्दी उनके कमरे की तरफ़ चल पड़ी। तीन दिन हो चुके थे, जब से छोटा आर्थर उसके पिता के साथ यहाँ से चला गया था, मेरे दिल का एक टुकड़ा अपने साथ ले जाकर। मैं उसे जान से ज़्यादा याद कर रही थी।

वो बच्चा मुझे अपने ही पेट से जन्मा हुआ लगता था; मैं खुद नहीं समझा सकती थी कि मुझे उससे इतनी गहरी मोहब्बत क्यों हो गई थी। उसे मेरी देखभाल में तब दिया गया था, जब वो कुछ ही हफ़्तों का था। मेरी सहकर्मियों और अनाथालय की कुछ ननों ने मुझे उसके बारे में पहले ही चेतावनी दे दी थी।

"लिली, ये बच्चा पूरा अनाथ नहीं है। इसकी माँ नहीं रही, लेकिन इसका बाप ज़िंदा है—बहुत अमीर आदमी, जो पहाड़ी की चोटी पर बनी उस डरावनी हवेली का मालिक है। कहते हैं, वो इतना क्रूर है कि अपनी ही बीवी को मार डाला। इस बच्चे से ज़्यादा लगाव मत रखना। बस अपना काम कर, और इसकी देखभाल कर।"

लेकिन मैंने उनकी बातों पर ध्यान ही नहीं दिया, बेवकूफ़ की तरह। मैंने उस बच्चे को ऐसे पाला जैसे वो मेरा ही खून हो। तो जब उसे मुझसे छीनकर ले गए, तो वो दर्द सहा नहीं जा रहा था। हर गुज़रते दिन के साथ, मैं अपने उस बच्चे के लिए और तरसती, जबकि मुझे अच्छी तरह मालूम था कि शायद मैं छोटे आर्थर को फिर कभी देख भी न पाऊँ।

अफ़वाहें उड़ रही थीं कि उसका बाप लंदन जाने की तैयारी कर रहा है, और बच्चे को भी साथ ले जाएगा। फिर भी, जब मैं कैथेड्रल की लंबी गलियारों से होकर मदर सुपीरियर के दफ़्तर की तरफ़ जा रही थी, तो अचानक मेरी आँखों में आँसू आ गए—हॉल में गूँजती रोने की वही जानी‑पहचानी आवाज़... आर्थर की थी। वो वापस अनाथालय में था!

धड़कता हुआ दिल लेकर मैं उस कमरे की तरफ़ भागी। दरवाज़ा खुलते ही मैंने उसे देखा—मेरा बच्चा—अपनी नई आया की बाँहों में तड़पता, ज़ोर‑ज़ोर से रोता हुआ। वहाँ मदर सुपीरियर भी थीं, और साथ में वो लंबा‑सा आदमी, काले ओवरकोट में, जिसे मैंने उस दिन दूर से देखा था जब वे आर्थर को ले गए थे। मैं जानती थी कि वही उसका बाप है। मैंने हल्का‑सा सिर झुका दिया, जबकि मेरा पूरा अस्तित्व चीख‑चीखकर कह रहा था कि मैं दौड़कर जाऊँ और आर्थर को अपनी बाँहों में भर लूँ।

"बच्चे को गोद में लो, लिली, जल्दी! दिख नहीं रहा, कैसे रो रहा है? फुर्ती करो!" मदर सुपीरियर की आवाज़ हमेशा की तरह कड़ी थी, लेकिन अब तक मैं उसकी आदी हो चुकी थी। अनाथालय में पलते‑पलते उस सख़्ती से गुज़रना मेरी आदत बन चुका था। मैंने चुपचाप सिर हिलाया और आगे बढ़ी। जैसे ही मैंने आर्थर को अपनी बाँहों में लिया, ऐसा लगा जैसे मेरी पूरी दुनिया के तारे अपनी सही जगह पर आकर ठहर गए हों।

मेरी ज़िंदगी की ठंडी, अँधेरी, उदास रातें मानो उजले, खिलते हुए बसंती दिनों में बदल गईं। उस बच्चे के लिए जो प्यार मेरे दिल में उमड़ रहा था, उसे शब्दों में बाँधना नामुमकिन था। मेरी बाँहों में आते ही वह पल भर में चुप हो जाता। उसे दाहिने हाथ में सहलाते हुए, जैसे मैं हमेशा करती थी, मैंने उसके चेहरे पर हल्का-सा हाथ फेरा, और उसने मुझे पहचानने वाले की तरह बिन दाँतों वाली मुस्कान दी। मेरे चेहरे पर भी एक बेवकूफ़-सी हँसी फैल गई; मेरा दिल बेहिसाब खुशी से भर उठा।

“हे भगवान, यह तो कमाल है…” अभी तक आर्थर को गोद में लिए हुई आया हैरत से बोली, मेरे और उसके बीच के मातृत्व भरे रिश्ते को देखकर साफ़-साफ़ दंग थी। वह कितनी देर से रो रहा होगा? यक़ीनन उसने भी मुझे उतना ही याद किया होगा, जितना मैंने उसे।

“क्या यही वह लड़की है जिसके बारे में आपने बताया था, मदर?” काले ओवरकोट वाले आदमी की गहरी आवाज़ कमरे में गूँज उठी। मदर सुपीरियर ने बनावटी-सी हँसी हँसी और उस अमीर आदमी से बड़े अपनापे से बोलीं।

“जी हाँ, मिस्टर वॉर्ड। लिली वाकई एक असाधारण देखभाल करने वाली है। यह कोई हैरानी की बात नहीं कि आपका बेटा आर्थर इस पर इतना मोहित हो गया है। दिखने में भले ही कम उम्र की लगे, मगर यह बाईस साल की जवान औरत है। बचपन में इसे इसी अनाथालय के दरवाज़े पर छोड़ दिया गया था, और तब से यहीं पली-बढ़ी है। इसके कोई बड़े सपने नहीं हैं, इसलिए यहीं रहकर अनाथ बच्चों की देखभाल करती है।” मेरी पूरी ज़िंदगी कुछ वाक्यों में समेट दी गई, लेकिन मेरा ध्यान तो बस उस बच्चे पर ही टिका था, जो अब मेरे तर्जनी उँगली को मज़बूती से, भूख के साथ चूस रहा था।

“तुम्हारा नाम लिली है?” मिस्टर वॉर्ड ने सीधे मुझसे पूछा। उनकी आवाज़ में सख़्ती थी, और मैंने झिझकते हुए सिर हिलाया।

“जी, हुज़ूर।” मेरा जवाब धीमा और सहमा हुआ था। उस लंबे-चौड़े आदमी की तरफ़ नज़र उठाकर देखना ही मेरे भीतर हल्का-सा डर जगा देता था।

“मैं चाहता हूँ कि तुम मेरे लिए काम करो, मेरे बेटे आर्थर की निजी आया बनकर।”

उसी दोपहर, मेरा छोटा-सा सूटकेस मिस्टर वॉर्ड की कार की डिक्की में रख दिया गया। बच्चा अब भी मेरी बाँहों में सिमटा हुआ था, और मुझे कार में बैठने की इजाज़त मिल गई। मेरा नया मालिक मेरे बगल में आकर बैठ गया, और ड्राइवर ने यॉर्क की सड़कों पर धीरे-धीरे कार बढ़ानी शुरू की।

टिंटेड शीशे से झाँकते हुए, मैंने सेंट लॉरेंट अनाथालय को धीरे-धीरे दूर होते देखा। वह जगह बीस से ज़्यादा सालों तक मेरा घर रही थी। अच्छे पलों को मैंने दिल से लगा लिया, और बुरे पलों को मन ही मन दफ़ना दिया। आगे की ओर देखते हुए मुझे एहसास हुआ कि मेरी ज़िंदगी का एक नया अध्याय मेरे सामने खुल रहा है।

मेरे पास बैठा आदमी किसी पत्थर की मूर्ति की तरह अकड़ा हुआ था, बिल्कुल अनछुआ, अनपहुँच। वह कुछ नहीं बोल रहा था, और एक पल को तो मुझे लगा कि शायद वह साँस भी नहीं ले रहा। लेकिन जैसे ही मेरी गोद में लेटा आर्थर रोने लगा, वह अचानक मेरी तरफ़ मुड़ा।

“तुम इसे चुप करवा सकती हो?” उसकी आवाज़ इतनी कड़ी थी कि उसके शब्दों की चुभन से मेरी अपनी आँखों में आँसू आ गए। मैंने किसी तरह अपने जज़्बात निगलते हुए जवाब दिया,

“उसे भूख लगी है, सर।”

“यह दूध का पाउडर नहीं पीता। तुमने इसे कैसे खिलाया था? जो भी करना पड़े, अभी करो!” मुझे पता था कि आर्थर को हमेशा से फार्मूला दूध पसंद नहीं था, और मेरे पास कोई दूसरा रास्ता भी नहीं था। मैंने अपने कपड़े की आगे की बटनें खोलीं, जिससे कई दिनों तक दूध न पिलाने के कारण भारी और संवेदनशील हो चुकी छाती का एक हिस्सा नज़र आने लगा। बच्चे को बाँहों में थोड़ा-सा ऊपर-नीचे करके मैंने उसे सही तरह से लगने दिया, और उसने लपककर चूसना शुरू कर दिया, अपनी भूख मिटाते हुए।

मैंने हल्की-सी साँस छोड़ी, उसका चेहरा सहलाते हुए, तीन दिन के विराम के बाद निप्पल में उठती हल्की-सी टीस को नज़रअंदाज़ करते हुए। तभी मुझे महसूस हुआ—मेरे बगल में बैठे उस आदमी की नज़र का बोझ। सहज ही जब मैंने उसकी तरफ़ देखा, गैरेट वॉर्ड ने एक पल के लिए भी नज़र नहीं हटाई।

उसकी आँखें मेरे चेहरे से होती हुई मेरी खुली छाती तक आ पहुँचीं, उनमें ऐसी साफ़-साफ़ इच्छा और संकेत भरे थे कि एक क्षण को मुझे सचमुच लगा, वह यहीं कार में झुककर उसे अपने लिए हथिया लेगा।

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